जबलपुर। मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का बहुचर्चित मामला एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। गुरुवार से जबलपुर हाईकोर्ट में इस प्रकरण की नियमित सुनवाई शुरू हो रही है। यह मामला केवल आरक्षण की वैधानिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले सात वर्षों से प्रभावित भर्ती प्रक्रियाओं, हजारों रिक्त पदों और लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय पहले ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को तीन माह के भीतर सुनवाई पूरी कर निर्णय देने का निर्देश दे चुका है। ऐसे में अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट की कार्यवाही और संभावित फैसले पर टिकी हैं।
2019 में बढ़ाया गया था ओबीसी आरक्षण
मार्च 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। सरकार का तर्क था कि प्रदेश में ओबीसी वर्ग की आबादी लगभग 48 प्रतिशत से अधिक है, इसलिए उन्हें जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
हालांकि, इस निर्णय के बाद राज्य में कुल आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया। इसमें अनुसूचित जाति (एससी) को 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 20 प्रतिशत तथा ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण शामिल है।
50 प्रतिशत सीमा बना विवाद का आधार
ओबीसी आरक्षण बढ़ाए जाने के बाद यह तर्क दिया गया कि राज्य में कुल आरक्षण की सीमा सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी (मंडल आयोग) फैसले में निर्धारित 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा से अधिक हो गई है। इसी आधार पर इस निर्णय को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद से मामला न्यायालय में लंबित है।
अब नियमित सुनवाई शुरू होने के साथ यह उम्मीद जताई जा रही है कि लंबे समय से लंबित इस विवाद का समाधान सामने आएगा, जिससे प्रभावित भर्ती प्रक्रियाओं और अभ्यर्थियों के भविष्य पर भी स्पष्टता आएगी।
